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शनिवार, 13 अगस्त 2016

अजीब दास्ताँ

"अजीब दास्ताँ"

-अमित चन्द्रवंशी"सुपा"

चल रहे पवन चल रहे श्वाश
मंगल बेला अमंगल का नाश
जन्म से लेकर अन्तिम तक
तारीफ  के भुखे  जमीन पर ।

नवीन कार्यो का गुमराह कर
गुनहो का सौदगर खुब मिले
मन  जीवन जीने की ललक
गरीबो  को  रोंदते  चल पड़े।

आज मेरे करीब दिल से जान
तू मेरी जान हैं तू मेरी प्यार हैं
तू मेरी शान है तू मेरी दिल हैं
सपनो में बैठे दिन रात ताके।

मेरे शहर में तेरा ख़ौफ़ हैं
चन्द दिनों की तुम मेहमान हो
आज मेरे शहर जीवन के साथ
गली से गुजरता हुआ मत दिख।।।

-अमित चन्द्रवंशी"सुपा"

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