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रविवार, 6 नवंबर 2016

जाड़ के दिन आगे

जाड़ के दिन आगे

-अमित चन्द्रवंशी "सुपा"

जाड़ के दिन आगे हवय संगी,
बिहनिया अऊ रतिया कन गोरसी ल सिपचथे।
शॉल सेटर म मुड़ गोड़ ल डांक के रहथे,
जाड़ के दिन म आगी तपत रहथे।

जेखर खेत के राहेर आघु पोठाथे,
आगु पाछु ल देख के खेत जाथे।
खोजत खोजत खेत ल चिनथे,
ओखर ल लइका मन चोरा के लाथे।

देवारी ह अभी अभी गे हवय,
थोड़किन दिन म नया साल आही।
जाड़ के दिन आगे सुघ्घर लगथे,
मनखे मन ठिठुरत ठिठुरत बैठे रहथे।

गन्ना के भाव बड़गे हवय सहर म,
गांव म लोग गन्ना चुसे बर मेछराथे।
सहर म रहके मनखे मन विरासत भूल जाथे,
गांव म  जिन्गी जीये ल बुजुर्ग मन पश्चाथे।

सहर के मन कुछु कुछु खाये के ल नई जानय,
गांव म रहबे त आनी बानी खाये के जानबे।
आगु पाछु जोंधरी भुटा चना मिलत रहथे,
मोर गांव संगी अब्बड़ सुघ्घर दिखथे।

-अमित चन्द्रवंशी "सुपा"
उम्र-17वर्ष 'विद्यार्थी'
रामनगर,कवर्धा जिला-कबीरधाम
छत्तीसगढ़ मो.-8085686829

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