फुटपाथ
उस शख्स का दोष क्या
भूख है साहेब
अच्छे अच्छे को गिरा देता है
युही वक़्त जाया नही करते
घर नही है
शर्मिंदा है हम तो
बिलखते उन आंखों में
दरिद्रता नही है
वरना किसी की हिम्मत नही
फुटपाथ में खाने को तरसे
तरसते है
कपड़े मकान भोजन के लिये
पेट बड़ा ज़ालिम है
तन नँगा न हो
डर है उनके आँखों में
नींद की तलाश में
फुटपाथ में सो जाते है
अमीर घर का बेटा दारू पीकर
कार चलता है
दिखाई नही देता है
गाड़ी चढ़ा देता है
फुटपाथ में मौत की तदात बढ़ रहा है
कायर नही है
शांति की तलाश है
अपराधी नही है हम
घर नही है कहाँ जाये
"शांति और व्यवस्था"
सवेंदनशील शब्द है
इसे कायम क्यो नही रखते
मोहताज है जिसके हम
तरस रहे है
युही फुटपाथ में नही पड़े होते
1 व्यक्ति भूखा मरा था
तब देश की शान डूब गई
कहने लगे हमारे यहाँ
भूख से एक भी मौत नही होती
अब तो फुटपाथ में 3लाख व्यक्ति
एक साल में भूखे मर जाते है
पैरवी कर रहे थे उस दिन
साहेब फैसला कर देते
आज फुटपाथ देखने को नही मिलता
-अमित चन्द्रवंशी "सुपा"
उम्र-18वर्ष 'बीएससी प्रथम वर्ष का छात्र'
रामनगर,कवर्धा, छत्तीसगढ़
वर्तमान दुर्ग साइन्स कॉलेज में अध्ययनरत
मो.-8085686829
Email- Amitchandravanshi74@gmail.com
बहुत ही मार्मिक सत्य। इस उम्र में ऐसे विचार आपको बहुत ऊपर लेकर जाएंगे।
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