मुस्कान..
वो एक रोटी
कचरे के ढेर से
उठाती है
अपने आस पास के
कूड़े में नजर दौड़ती है
जो तेज
प्रज्वलित होता है
मानो कुछ कहि रही हो
खुद अपनी भूख
न मिटाकर
अपने बच्चो को खिलाती है
किसे कहे
सुने वाले कौन है?
अपनी बात मन में
दबा लिए
शब्द
होठों से उतरते है
कुछ कह नही पाती है
पानी तो मिल
जाता है
विकट जीवन में
रोटी के लिए
तरसते है
उड़ते हुए पंख भी
रोटी के तलाश मे है
संसार मे
सब कुछ है
मुस्कान ओझल
हो जाती है
विवश है
नाराजगी
किसके लिए?
समझता हूं
विश्वास जहाँ
वहाँ रोटी मिल जाये
मुस्कान मन मे
चमकता हुआ
अविश्वास है क्या??
-अमित चन्द्रवंशी "सुपा"
उम्र-18 'बीएससी प्रथम वर्ष का छात्र'
रामनगर ,कवर्धा, छत्तीसगढ़
वर्तमान दुर्ग मे अध्ययनरत
मो.-8085686829
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