कही खो न जाये हिंदी
संस्कृत से आयी है हिंदी,
हिन्द की पहचान है हिंदी।
जनमानस की भाषा है, सरलता है;
हमारी मातृ भाषा है, ममतामयी है।
क्या थी हिंदी? कहाँ से आई हिंदी?
बनकर रह गई हम सबकी जान।
पहचान स्वाभिमान बनकर है,
एकता का बंधन है चारो ओर।
प्यार, एकता, शांति का अनूठा छाप है,
राष्ट्रभाषा भारत की दर्शन कराती है।
अनेकता को एकता में बांधती है,
दसों दिशा में खुश्बू बिखेरती है।
अत्याचारों के जब हुआ प्रहार,
कलम उठाये साहित्यकारो ने।
देश मे अराजकता फैली थी,
तब शांति का पाठ हिंदी से मिला।
मुझसे पहचान है आप सबकी,
मेरा बिना कुछ नही है संस्कृति।
गर जिंदगी में मैं खो गई कही?
हिन्द की सूत्रपात डूब जायेगी।
आखिर कम समय मे मैं बूढ़ी हो गई,
कहने को तो बहुत है पर शिकायत किसे?
दूजा व्यवहार आप सब करे रहे,
फिर हाथ किसके सामने फैलाऊँ?
अंग्रेजी, जर्मन, फ्रेंच का जमाना है,
टेक्निकल में आगे बढ़ना है।
मुझे रौंद कर आगे बढ़ जाओगे,
एक समय संस्कृति खतरे में पड़ जायेगा,
क्या बना बैठे? कहते है मातृभाषा
करते है दूजा व्यवहार।
मुझे अभी जन जन में फैलना है,
मुझे मेरा अधिकार चाहिए।
क्यो नही जब रसिया में रशियन,
चाइना में चीनी, अमेरिका में अमेरीकन अंग्रेजी,
फिर मुझे हिन्द में ज्ञान देने का इजाजत क्यो नही?
शिकायत बहुत है जाऊ किधर?
खोने का डर सता रहा है मुझे।
पर हिन्द की शान हिंदी आजादी तक था?
अब क्यो नही? मैं तो हमेशा एकता का सन्देश-
दे जाता हूं, फिर दूजा व्यवहार क्यो?
-अमित चन्द्रवंशी "सुपा"
उम्र-18वर्ष 'बीएससी प्रथम वर्ष का छात्र'
रामनगर,कवर्धा, छत्तीसगढ़
मो.-8085686829
बहुत बेहतरीन। आप जैसे जागरुक युवा ही सबको जागरूक कर रहे हैं इसके लिए आपका साधुवाद।
जवाब देंहटाएंबहुत बहुत शुक्रिया
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