बिक गया..
बाजार देखा
व्यपारियो का
अनाज बिक गया
खेत देखा
तो किसान?
मुरझाकर
मेड़ में पड़ा है।
लहलहाती फसलें
सौंधी सौंधी महक
चारो दिशा में
बिखर रही है
फिर भी
आखिर किसान क्यो?
सिकुड़कर सो गया
घर मे छत न हो
पर आस
और आँख
विशाल आकाश की ओर
टकटकी लागये हुए
विश्व को
जीवनदान दे रहे है।
कभी अपने लिये नही
कभी स्वार्थ नही
विश्व के लिये
अनाज उपजाये
निरन्तर सेवा किये
विकास में
हाथ किसान का।
भूख में किसान का
हड्डियां सिकुड़ गया
राह न बदलकर
हमेशा देश हित
विश्व हित को ध्यान रखते
किसान तो है
अनाज बिक गया।
-अमित चन्द्रवंशी "सुपा"
उम्र-19वर्ष 'विद्यार्थी'
रामनगर,कवर्धा,छत्तीसगढ़
मो.-8085686829
Behtarin
जवाब देंहटाएंThank u so much
हटाएंबहुत अच्छी रचना।
जवाब देंहटाएंThanks a lot
हटाएंबहुत ही बेहतरीन रचना । आप इतनी कम उम्र में इतने अच्छे रचनाकार हैं।
जवाब देंहटाएंThank u very much✌️😍♥️
हटाएंGood
हटाएंThanks a lot
हटाएं