जिंदा हु क्या मैं
जलते हुए संसार से
सब इधर उधर हो रहे है
मानो पंखों तो है
पर उड़ान बेकार हो
जिंदा हु क्या मैं
समय के पैमाने में
सब ढलते नजर आ रहे है
सभी को लक्ष्य की पड़ी है
जिंदगी बेसाहबी दुनिया है
जिंदा हु क्या मैं
बैर किसी से न झगड़ा
जल रहे है खुद-ब-खुद
पंख फैलाये
तो उड़ान किस लिए
जिंदा हु क्या मैं
सब्र की बाधा तोड़
चल पड़े है मंजिल की ओर
टकराव तो बहुत है
मन बैठता नही है
जिंदा हु क्या मैं
पर्यावरण का विनाश कर
प्रगति कर रहे है
अभी तो शुरुआत है
आगे तो पूरी जिंदगी है
जिंदा हु क्या मैं
आपस में लड़ नही रहे है
तब तक तो ठीक है
जब भीड़ बैठे आपस में
महायुद्ध की कल्पना है
जिंदा हु क्या मैं
राह गुजर मंजिल तक जाता है
खाली हाथ नही
दो दाने साथ रखा रहता है
भूख न मरे प्यास से न तड़पे
जिंदा हु क्या मैं
खाली हाथ आये है
चले जायेंगे भी
साथ काफिल तो होगी
हमारी यादे पहचान बन जायेगी
जिंदा हु क्या मैं
-अमित चन्द्रवंशी "सुपा"
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